उस वक़्त चौथाई मुल्क के हाकिम हेरोदेस ने ईसा' की शोहरत सुनी। और अपने ख़ादिमों से कहा “ये यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला है वो मुर्दों में से जी उठा है; इसलिए उससे ये मो'जिज़े ज़ाहिर होते हैं।” क्यूँकि हेरोदेस ने अपने भाई फ़िलिप्पुस की बीवी हेरोदियास की वजह से यूहन्ना को पकड़ कर बाँधा और क़ैद ख़ाने में डाल दिया था। क्योंकि यूहन्ना ने उससे कहा था “कि इसका रखना तुझे जायज नहीं।” और वो हर चंद उसे क़त्ल करना चाहता था, मगर आम लोगों से डरता था क्यूँकि वो उसे नबी मानते थे। लेकिन जब हेरोदेस की साल गिरह हुई तो हेरोदियास की बेटी ने महफ़िल में नाच कर हेरोदेस को ख़ुश किया। इस पर उसने क़सम खाकर उससे वा'दा किया “जो कुछ तू माँगेगी तुझे दूँगा।” उसने अपनी माँ के सिखाने से कहा,“मुझे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर थाल में यहीं मँगवा दे।” “ बादशाह ग़मगीन हुआ; मगर अपनी क़समों और मेहमानों की वजह से उसने हुक्म दिया कि “” दे दिया जाए।” १०और आदमी भेज कर क़ैद ख़ाने में यूहन्ना का सिर कटवा दिया। ११और उस का सिर थाल में लाया गया और लड़की को दिया गया; और वो उसे अपनी माँ के पास ले गई। १२और उसके शागिर्दों ने आकर लाश उठाई और उसे दफ़्न कर दिया, और जा कर ईसा’ को ख़बर दी। १३जब ईसा' ने ये सुना तो वहाँ से नाव पर अलग किसी वीरान जगह को रवाना हुआ और लोग ये सुनकर शहर शहर से पैदल उसके पीछे गए। १४उसने उतर कर बड़ी भीड़ देखी और उसे उन पर तरस आया; और उसने उनके बीमारों को अच्छा कर दिया। १५जब शाम हुई तो शागिर्द उसके पास आकर कहने लगे “जगह वीरान है और वक़्त गुज़र गया है लोगों को रुक़्सत कर दे ताकि गाँव में जाकर अपने लिए खाना खरीद लें।” १६ईसा' ने उनसे कहा , “इन्हें जाने की ज़रूरत नहीं, तुम ही इनको खाने को दो।” १७उन्होंने उससे कहा “यहाँ हमारे पास पाँच रोटियाँ और दो मछलियों के सिवा और कुछ नहीं।” १८उसने कहा “वो यहाँ मेरे पास ले आओ,” १९और उसने लोगों को घास पर बैठने का हुक्म दिया। फिर उस ने वो पाँच रोटियों और दो मछलियाँ लीं और आसमान की तरफ़ देख कर बर्कत दी और रोटियाँ तोड़ कर शागिर्दों को दीं और शागिर्दों ने लोगो को। २०और सब खाकर सेर हो गए; और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई बारह टोकरियाँ उठाईं। २१और खानेवाले औरतों और बच्चों के सिवा पाँच हज़ार मर्द के क़रीब थे। २२और उसने फ़ौरन शागिर्दों को मजबूर किया कि नाव में सवार होकर उससे पहले पार चले जाएँ जब तक वो लोगों को रुख़्सत करे। २३और लोगों को रुख़्सत करके तन्हा दुआ करने के लिए पहाड़ पर चढ़ गया; और जब शाम हुई तो वहाँ अकेला था। २४मगर नाव उस वक़्त झील के बीच में थी और लहरों से डगमगा रही थी; क्यूँकि हवा मुख़ालिफ़ थी। २५और वो रात के चौथे पहर झील पर चलता हुआ उनके पास आया। २६शागिर्द उसे झील पर चलते हुए देखकर घबरा गए और कहने लगे “भूत है,”और डर कर चिल्ला उठे। २७ईसा' ने फ़ौरन उन से कहा “इत्मिनान रख्खो! मैं हूँ। डरो मत।” २८पतरस ने उससे जवाब में कहा “ऐ ख़ुदावन्द, अगर तू है तो मुझे हुक्म दे कि पानी पर चलकर तेरे पास आऊँ।” २९उस ने कहा ,“आ।”पतरस नाव से उतर कर ईसा' के पास जाने के लिए पानी पर चलने लगा। ३०मगर जब हवा देखी तो डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला कर कहा “ऐ ख़ुदावन्द, मुझे बचा!” ३१ईसा' ने फ़ौरन हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ लिया। और उससे कहा,“ऐ कम ईमान तूने क्यूँ शक किया ?” ३२जब वो नाव पर चढ़ आए तो हवा थम गई; ३३“ जो नाव पर थे, उन्होंने सज्दा करके कहा “यक़ीनन तू ““ख़ुदा”” का बेटा है!”” ३४वो पार जाकर गनेसरत के इलाक़े में पहुँचे। ३५और वहाँ के लोगों ने उसे पहचान कर उस सारे इलाके में ख़बर भेजी; और सब बीमारों को उस के पास लाए। ३६और वो उसकी मिन्नत करने लगे कि उसकी पोशाक का किनारा ही छू लें और जितनों ने उसे छुआ वो अच्छे हो गए।