दो दिन के बा'द फ़सह और ई'द- ए फितर होने वाली थी और सरदार काहिन और फ़क़ीह मौका ढूँड रहे थे कि उसे क्यूँकर धोखे से पकड़ कर क़त्ल करें। क्यूँकि कहते थे ई'द में नहीं “ऐसा न हो कि लोगों में बलवा हो जाए” जब वो बैत अन्नियाह में शमा'ऊन कोढ़ी के घर में खाना खाने बैठा तो एक औरत जटामासी का बेशक़ीमती इत्र संगे मरमर के इत्र दान में लाई और इत्र दान तोड़ कर इत्र को उसके सिर पर डाला। मगर कुछ अपने दिल में ख़फ़ा हो कर कहने लगे“ये इत्र किस लिए ज़ाया किया गया| क्यूँकि”ये इत्र तीन सौ दीनार से ज्यादा में बिक़ कर ग़रीबों को दिया जा सकता था; और वो उसे मलामत करने लगे। ईसा' ने कहा उसे छोड़ दो उसे क्यूँ दिक़ करते हो“उसने मेरे साथ भलाई की है । क्यूँकि ग़रीब और ग़ुरबा तो हमेशा तुम्हारे पास हैं जब चाहो उनके साथ नेकी कर सकते हो; लेकिन मैं तुम्हारे पास हमेशा न रहूँगा। जो कुछ वो कर सकी उसने किया उसने दफ़न के लिए मेरे बदन पर पहले ही से इत्र मला। “ मैं तुम से सच कहता हूँ कि ““तमाम दुनिया में जहाँ कहीं इन्जील की मनादी की जाएगी, ये भी जो इस ने किया उस की यादगारी में बयान किया जाएगा।”” १०फिर यहूदाह इस्करियोती जो उन बारह में से था, सरदार काहिन के पास चला गया ताकि उसे उनके हवाले कर दे। ११वो ये सुन कर ख़ुश हुए और उसको रुपये देने का इक़रार किया और वो मौका ढूँडने लगा कि किस तरह क़ाबू पाकर उसे पकड़वा दे। १२ई'द 'ए फ़ितर के पहले दिन या'नी जिस रोज़ फ़सह को ज़बह किया करते थे“उसके शागिर्दों ने उससे कहा? तू कहाँ चाहता है कि हम जाकर तेरे लिए फ़सह खाने की तैयारी करें।” १३उसने अपने शागिर्दो में से दो को भेजा और उनसे कहा शहर में जाओ एक शख़्स पानी का घड़ा लिए हुए तुम्हें मिलेगा“उसके पीछे हो लेना। १४और जहाँ वो दाख़िल हो उस घर के मालिक से कहना‘उस्ताद कहता है? मेरा मेहमान खाना जहाँ मैं अपने शागिर्दों के साथ फ़सह खाउँ कहाँ है।’ १५वो आप तुम को एक बड़ा मेहमान खाना आरास्ता और तैयार दिखाएगा वहीं हमारे लिए तैयारी करना।” १६पस शागिर्द चले गए और शहर में आकर जैसा ईसा' ने उन से कहा था वैसा ही पाया और फ़सह को तैयार किया। १७जब शाम हुई तो वो उन बारह के साथ आया। १८और जब वो बैठे खा रहे थे तो ईसा' ने कहा“मैं तुम से सच कहता हूँ कि तुम में से एक जो मेरे साथ खाता है मुझे पकड़वाएगा।” १९वो दुखी होकर और एक एक करके उससे कहने लगे“क्या मैं हूँ ?” २०उसने उनसे कहा, वो बारह में से एक है जो मेरे साथ थाल में हाथ डालता है। २१क्यूँकि इब्ने आदम तो जैसा उसके हक़ में लिखा है जाता ही है लेकिन उस आदमी पर अफ़सोस जिसके वसीले से इब्ने आदम पकड़वाया जाता है,अगर वो आदमी पैदा ही न होता ”तो उसके लिए अछा था। २२और वो खा ही रहे थे कि उसने रोटी ली “और बरकत देकर तोड़ी और उनको दी और कहा लो ये मेरा बदन है।” २३फिर उसने प्याला लेकर शुक्र किया और उनको दिया और उन सभों ने उस में से पिया। २४उसने उनसे कहा “ये मेरा वो अहद का ख्नून है जो बहुतेरों के लिए बहाया जाता है। २५मैं तुम से सच कहता हूँ कि अंगूर का शीरा फिर कभी न पिऊँगा; उस दिन तक कि ख़ुदा की बादशही में नया न पिऊँ।” २६फिर हम्द गा कर बाहर ज़ैतून के पहाड़ पर गए। २७और ईसा' ने उनसे कहा “तुम सब ठोकर खाओगे क्यूँकि लिखा है, मैं चरवाहे को मारूँगा‘और भेड़ें इधर उधर हो जाएँगी।’ २८मगर मैं अपने जी उठने के बा'द तुम से पहले गलील को जाउँगा।” २९पतरस ने उससे कहा चाहे सब ठोकर खाएँ लेकिन मैं न खाउँगा।” ३०ईसा' ने उससे कहा मैं तुझ से सच कहता हूँ। कि तू आज इसी रात मुर्ग के दो बार बाँग देने से पहले तीन बार मेरा इन्कार करेगा।” ३१लेकिन उसने बहुत ज़ोर देकर कहा “अगर तेरे साथ मुझे मरना भी पड़े तोभी तेरा इन्कार हरगिज़ न करूँगा इसी तरह और सब ने भी कहा। ३२“फिर वो एक जगह आए जिसका नाम गतसिमनी था और उसने अपने शागिर्दों से कहा,यहाँ बैठे रहो जब तक मैं दुआ करूँ।” ३३और पतरस और या'क़ूब और यूहन्ना को अपने साथ लेकर निहायत हैरान और बेक़रार होने लगा। ३४“और उसने कहा मेरी जान निहायत ग़मगीन है यहाँ तक कि मरने की नौबत पहुँच गई है तुम यहाँ ठहरो और जागते रहो।” ३५और वो थोड़ा आगे बढ़ा और ज़मीन पर गिर कर दुआ करने लगा, कि अगर हो सके तो ये वक़्त मुझ पर से टल जाए। ३६“और कहा ऐ अब्बा ऐ बाप तुझ से सब कुछ हो सकता है इस प्याले को मेरे पास से हटा ले तोभी जो मैं चाहता हूँ वो नहीं बल्कि जो तू चाहता है वही हो।” ३७फिर वो आया और उन्हें सोते पाकर पतरस से कहा“ऐ शमा'ऊन तू सोता है? क्या तू एक घड़ी भी न जाग सका। ३८जागो और दुआ करो, ताकि आज़माइश में न पड़ो रूह तो मुसतैद है मगर जिस्म कमज़ोर है।” ३९वो फिर चला गया और वही बात कह कर दुआ की। ४०और फिर आकर उन्हें सोते पाया क्यूँकि उनकी आँखें नींद से भरी थीं और वो न जानते थे कि उसे क्या जवाब दें। ४१फिर तीसरी बार आकर उनसे कहा “अब सोते रहो और आराम करो बस वक़्त आ पहुँचा है देखो; इब्ने आदम गुनाहगारों के हाथ में हवाले किया जाता है। ४२उठो चलो देखो मेरा पकड़वाने वाला नज़दीक आ पहुँचा है।” ४३वो ये कह ही रहा था कि फ़ौरन यहूदाह जो उन बारह में से था और उसके साथ एक बड़ी भीड़ तलवारें और लाठियाँ लिए हुए सरदार काहिनों और फ़क़ीहों की तरफ़ से आ पहुँची। ४४और उसके पकड़वाने वाले ने उन्हें ये निशान दिया था जिसका मैं बोसा लूँ वही है उसे पकड़ कर हिफ़ाज़त से ले जाना। ४५“ वो आकर फ़ौरन उसके पास गया और कहा!” ऐ रब्बी “” और उसके बोसे लिए।” ४६उन्होंने उस पर हाथ डाल कर उसे पकड़ लिया। ४७उन में से जो पास खड़े थे एक ने तलवार खींचकर सरदार काहिन के नौकर पर चलाई और उसका कान उड़ा दिया। ४८ईसा' ने उनसे कहा क्या तुम तलवारें और लाठियाँ लेकर मुझे “डाकू की तरह पकड़ने निकले हो? ४९मैं हर रोज़ तुम्हारे पास हैकल में ता'लीम देता था, और तुम ने मुझे नहीं पकड़ा लेकिन ये इसलिए हुआ कि लिख हुआ पूरा हों।” ५०इस पर सब शगिर्द उसे छोड़कर भाग गए। ५१मगर एक जवान अपने नंगे बदन पर महीन चादर ओढ़े हुए उसके पीछे हो लिया, उसे लोगों ने पकड़ा। ५२मगर वो चादर छोड़ कर नंगा भाग गया। ५३फिर वो ईसा' को सरदार काहिन के पास ले गए; और अब सरदार काहिन और बुज़ुर्ग और फ़क़ीह उसके यहाँ जमा हुए। ५४पतरस फासले पर उसके पीछे पीछे सरदार काहिन के दिवानखाने के अन्दर तक गया और सिपाहियों के साथ बैठ कर आग तापने लगा। ५५और सरदार काहिन सब सद्रे-अदालत वाले ईसा' को मार डालने के लिए उसके ख़िलाफ़ गवाही ढूँडने लगे मगर न पाई। ५६क्यूँकि बहुतेरों ने उस पर झूठी गवाहियाँ तो दीं लेकिन उनकी गवाहियाँ सही न थीं। ५७फिर कुछ ने उठकर उस पर ये झूठी गवाही दी। ५८“हम ने उसे ये कहते सुना है मैं इस मक़दिस को जो हाथ से बना है ढाऊँगा और तीन दिन में दूसरा बनाऊँगा जो हाथ से न बना हो।” ५९लेकिन इस पर भी उसकी गवाही सही न निकली। ६०“फिर सरदार काहिन ने बीच में खड़े हो कर ईसा' से पूछा तू कुछ जवाब नहीं देता? ये तेरे ख़िलाफ़ क्या गवाही देते हैं ।” ६१“मगर वो ख़ामोश ही रहा और कुछ जवाब न दिया? सरदार काहिन ने उससे फिर सवाल किया और कहा क्या तू उस यूसुफ़ का बेटा मसीह है।” ६२ईसा' ने कहा, “हाँ मैं हूँ। और तुम इब्ने आदम को क़ादिर ए मुतलक़ की दहनी तरफ़ बैठे और आसमान के बादलों के साथ आते देखोगे।” ६३सरदार काहिन ने अपने कपड़े फ़ाड़ कर कहा“अब हमें गवाहों की क्या जरूरत रही। ६४तुम ने ये कुफ़्र सुना तुम्हारी क्या राय है? उन सब ने फ़तवा दिया कि वो क़त्ल के लायक़ है।” ६५तब कुछ उस पर थूकने और उसका मुँह ढाँपने और उसके मुक्के मारने और उससे कहने लगे “नबुव्वत की बातें सुना !और सिपाहियों ने उसे तमाँचे मार मार कर अपने कब्ज़े में लिया।” ६६जब पतरस नीचे सहन में था तो सरदार काहिन की लौडीयों में से एक वहाँ आई। ६७“और पतरस को आग तापते देख कर उस पर नज़र की”और कहने लगी तू भी उस नासरी ईसा' के साथ था। ६८उसने इन्कार किया और कहा“मैं तो न जानता और न समझता हूँ।” कि तू क्या कहती है फिर वो बाहर सहन में गया [और मुर्ग़ ने बाँग दी।] ६९वो लौंडी उसे देख कर उन से जो पास खड़े थे, फिर कहने लगी “ये उन में से है।” ७०“मगर उसने फिर इन्कार किया और थोड़ी देर बा'द उन्होंने जो पास खड़े थे पतरस से फिर कहा बेशक़ तू उन में से है क्यूँकि तू गलीली भी है।” ७१“मगर वो ला'नत करने और क़सम खाने लगा में इस आदमी को जिसका तुम ज़िक्र करते हो नहीं जानता ।” ७२और फ़ौरन मुर्ग ने दूसरी बार बाँग दी पतरस को वो बात जो ईसा' ने उससे कही थी याद आई मुर्ग के दो बार बाँग देने से पहले“तू तीन बार इन्कार करेगा और उस पर ग़ौर करके रो पड़ा।”