१ग़रज़ हम ताक़तवरों को चाहिए कि कमज़ोरों के कमज़ोरियों की रि'आयत करें न कि अपनी ख़ुशी करें। २हम में हर शख़्स अपने पड़ोसी को उसकी बेहतरी के वास्ते ख़ुश करे; ताकि उसकी तरक़्क़ी हो। ३क्यूँकि मसीह ने भी अपनी ख़ुशी नहीं की“बल्कि यूँ लिखा है; तेरे लान तान करनेवालों के लान'तान मुझ पर आ पड़े।” ४क्यूंकि जितनी बातें पहले लिखी गईं, वो हमारी ता'लीम के लिए लिखी गईं, ताकि सब्र और किताब'ए मुक़द्दस की तसल्ली से उम्मीद रखे । ५और ख़ुदा सब्र और तसल्ली का चश्मा तुम को ये तौफ़ीक दे कि मसीह ईसा' के मुताबिक़ आपस में एक दिल रहो। ६ताकि तुम एक दिल और यक ज़बान हो कर हमारे ख़ुदावन्द ईसा' मसीह के ख़ुदा और बाप की बड़ाई करो। ७पस जिस तरह मसीह ने ख़ुदा के जलाल के लिए तुम को अपने साथ शामिल कर लिया है उसी तरह तुम भी एक दूसरे को शामिल कर लो। ८में कहता हूँ कि ख़ुदा की सच्चाई साबित करने के लिए मख़्तूनों का ख़ादिम बना ताकि उन वा'दों को पूरा करूं जो बाप दादा से किए गए थे। ९और ग़ैर क़ौमें भी रहम की वजह से ख़ुदा की हम्द करें चुनाँचें लिखा है, “इस वास्ते मैं ग़ैर क़ौमों में तेरा इक़रार करूँगा”और तेरे नाम के गीत गाऊँगा।” १०और फिर वो फ़रमाता है“ऐ'ग़ैर क़ौमों”उसकी उम्मत के साथ ख़ुशी करो। ११फिर ये “ऐ,ग़ैर क़ौमों ख़ुदावन्द की हम्द करो और उम्मतें उसकी सिताइश करें!” १२और यसायाह भी कहता है यस्सी की जड़ ज़ाहिर होगी या'नी वो शख़्स जो ग़ैर क़ौमों पर हुकूमत करने को उठेगा, उसी से ग़ैर क़ौमें उम्मीद रख्खेंगी। १३पस ख़ुदा जो उम्मीद का चश्मा है तुम्हें ईमान रखने के ज़रिए सारी ख़ुशी और इत्मीनान से मा'मूर करे ताकि रूह- उल क़ुद्दूस की क़ुदरत से तुम्हारी उम्मीद ज़्यादा होती जाए। १४ऐ मेरे भाइयो; मैं ख़ुद भी तुम्हारी निस्बत यक़ीन रखता हूँ कि तुम आप नेकी से मा'मूर और मुकम्मल मा'रिफ़त से भरे हो और एक दूसरे को नसीहत भी कर सकते हो। १५तोभी मैं ने कुछ जगह ज़्यादा दिलेरी के साथ याद दिलाने के तौर पर इसलिए तुम को लिखा; कि मुझ को ख़ुदा की तरफ़ से ग़ैर क़ौमों के लिए मसीह ईसा' के ख़ादिम होने की तौफ़ीक़ मिली है। १६कि मैं ख़ुदा की ख़ुशख़बरी की ख़िदमत इमाम की तरह अंजाम दूँ ताकि ग़ैर क़ौमें नज़्र के तौर पर रूह- उल क़ुद्दूस से मुक़द्दस बन कर मक़्बूल हो जाएँ। १७पस मैं उन बातों में जो ख़ुदा से मुताल्लिक़ हैं मसीह ईसा' के ज़रिए फ़ख़्र कर सकता हूँ। १८क्यूंकि मुझे किसी और बात के ज़िक्र करने की हिम्मत नहीं सिवा उन बातों के जो मसीह ने ग़ैर क़ौमों के ताबे करने के लिए क़ौल और फ़े'ल से निशानों और मोजिज़ों की ताक़त से और रूह- उल क़ुद्दस की क़ुदरत से मेरे वसीले से कीं। १९यहाँ तक कि मैने यरूशलीम से लेकर चारों तरफ़ इल्लुरिकुम तक मसीह की ख़ुशख़बरी की पूरी पूरी मनादी की। २०और मैं ने यही हौसला रखा कि जहाँ मसीह का नाम नहीं लिया गया वहाँ ख़ुशख़बरी सुनाऊँ ताकि दूसरे की बुनियाद पर इमारत न उठाऊँ। २१बल्कि जैसा लिखा है वैसा ही हो जिनको उसकी ख़बर नहीं पहुँची वो देखेंगे; और जिन्होंने नहीं सुना वो समझेंगे। २२इसी लिए में तुम्हारे पास आने से बार बार रुका रहा। २३मगर चुँकि मुझ को अब इन मुल्कों में जगह बाक़ी नहीं रही और बहुत बरसों से तुम्हारे पास आने का मुश्ताक़ भी हूँ। २४इसलिए जब इस्फ़ानिया को जाऊँगा तो तुम्हारे पास होता हुआ जाऊँगा; क्यूँकि मुझे उम्मीद है कि उस सफ़र में तुम से मिलूँगा और जब तुम्हारी सोहबत से किसी क़दर मेरा जी भर जाएगा तो तुम मुझे उस तरफ़ रवाना कर दोगे। २५लेकिन फिलहाल तो मुक़द्दसों की ख़िदमत करने के लिए यरूशलीम को जाता हूँ। २६क्यूंकि मकिदुनिया और आख़्या के लोग यरूशलीम के ग़रीब मुक़द्दसों के लिए कुछ चन्दा करने को रज़ामन्द हुए। २७किया तो रज़ामन्दी से मगर वो उनके क़र्ज़दार भी हैं क्यूँकि जब ग़ैर क़ौमें रूहानी बातों में उनकी शरीक़ हुई हैं तो लाज़िम है कि जिस्मानी बातों में उनकी ख़िदमत करें। २८पस मैं इस खिदमत को पूरा करके और जो कुछ हासिल हुआ उनको सौंप कर तुम्हारे पास होता हुआ इस्फ़ानिया को जाऊँगा। २९और मैं जानता हूँ कि जब तुम्हारे पास आऊँगा तो मसीह की कामिल बरकत लेकर आऊँगा। ३०ऐ, भाइयो; मैं ईसा' मसीह का जो हमारा ख़ुदावन्द है वास्ता देकर और रूह की मुहब्बत को याद दिला कर तुम से गुज़ारिश करता हूँ कि मेरे लिए ख़ुदा से दुआ करने में मेरे साथ मिल कर मेहनत करो। ३१कि मैं यहूदिया के नाफ़रमानों से बचा रहूँ, और मेरी वो ख़िदमत जो यरूशलीम के लिए है मुक़द्दसों को पसन्द आए। ३२और ख़ुदा की मर्ज़ी से तुम्हारे पास ख़ुशी के साथ आकर तुम्हारे साथ आराम पाऊँ। ३३ख़ुदा जो इत्मिनान का चश्मा है तुम सब के साथ रहे; आमीन।