फिर सबत के दिन यूँ हुआ कि वो खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके शागिर्द बालें तोड़-तोड़ कर और हाथों से मल-मलकर खाते जाते थे | “ और फरीसियों में से कुछ लोग कहने लगे, ““तुम वो काम क्यूँ करते हो जो सबत के दिन करना ठीक नहीं |""” “ ईसा' ने जवाब में उनसे कहा, ““क्या तुम ने ये भी नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उसके साथी भूखे थे तो उसने क्या किया?"”” “ वो क्यूँकर खुदा के घर में गया, और नज्र की रोटियाँ लेकर खाई जिनको खाना कहिनों के सिवा और किसी को ठीक नहीं, और अपने साथियों को भी दीं |""” “ फिर उसने उनसे कहा, ““इब्न-ए-आदम सबत का मालिक है |""” और यूँ हुआ कि किसी और सबत को वो 'इबादतखाने में दाखिल होकर ता'लीम देने लगा | वहाँ एक आदमी था जिसका दहिना हाथ सूख गया था | और आलिम और फरीसी उसकी ताक में थे, कि आया सबत के दिन अच्छा करता है या नहीं, ताकि उस पर इल्ज़ाम लगाने का मौका' पाएँ | “ मगर उसको उनके ख़याल मा'लूम थे; पस उसने उस आदमी से जिसका हाथ सुखा था कहा, ““उठ, और बीच में खड़ा हो !""” “ ईसा' ने उनसे कहा, ““मैं तुम से ये पूछता हूँ कि आया सबत के दिन नेकी करना ठीक है या बदी करना? जान बचाना या हलाक करना?"”” १०“ और उन सब पर नज़र करके उससे कहा, ““अपना हाथ बढ़ा ! ““उसने बढ़ाया और उसका हाथ दुरुस्त हो गया |” ११वो आपे से बाहर होकर एक दुसरे से कहने लगे कि हम ईसा' के साथ क्या करें | १२और उन दिनों में ऐसा हुआ कि वो पहाड़ पर दु'आ करने को निकला और खुदा से दु'आ करने में सारी रात गुज़ारी | १३जब दिन हुआ तो उसने अपने शागिर्दों को पास बुलाकर उनमे से बारह चुन लिए और उनको रसूल का लकब दिया : १४या'नी शमा'ऊन जिसका नाम उसने पतरस भी रख्खा, और अन्द्रियास, और या'कूब, और युहन्ना, और फिलिप्पुस, और बरतुल्माई, १५और मत्ती, और तोमा, और हलफ़ई का बेटा या'क़ूब, और शमा'ऊन जो ज़ेलोतेस कहलाता था, १६और या'कूब का बेटा यहुदाह, और यहुदाह इस्करियोती जो उसका पकड़वाने वाला हुआ | १७और वो उनके साथ उतर कर हमवार जगह पर खड़ा हुआ, और उसके शागिर्दों की बड़ी जमा'अत और लोगों की बड़ी भीड़ वहाँ थी, जो सारे यहुदिया और यरूशलीम और सूर और सैदा के बहरी किनारे से उसकी सुनने और अपनी बीमारियों से शिफ़ा पाने के लिए उसके पास आई थी | १८और जो बदरूहों से दुख पाते थे वो अच्छे किए गए | १९और सब लोग उसे छूने की कोशिश करते थे, क्यूँकि कुव्वत उससे निकलती और सब को शिफ़ा बख्शती थी | २०“ फिर उसने अपने शागिर्दों की तरफ़ नज़र करके कहा, ““मुबारक हो तुम जो गरीब हो, क्यूँकि खुदा की बादशाही तुम्हारी है |”” २१“ ““मुबारक हो तुम जो अब भूखे हो, क्यूँकि आसूदा होगे ““मुबारक हो तुम जो अब रोते हो, क्यूँकि हँसोगे” २२“ ““जब इब्न-ए-आदम की वज़ह से लोग तुम से 'दुश्मनी रख्खेंगे, और तुम्हें निकाल देंगे, और ला'न-ता'न करेंगे,"”” २३“ ““उस दिन खुश होना और ख़ुशी के मारे उछलना, इसलिए कि देखो आसमान पर तुम्हारा अज्र बड़ा है; क्यूँकि उनके बाप-दादा नबियों के साथ भी ऐसा ही किया करते थे |” २४“ ““मगर अफ़सोस तुम पर जो दौलतमन्द हो, क्यूँकि तुम अपनी तसल्ली पा चुके |” २५“ ““अफ़सोस तुम पर जो अब सेर हो, क्यूँकि भूखे होगे | ““अफ़सोस तुम पर जो अब हँसते हो, क्यूँकि मातम करोगे और रोओगे |""” २६“ ““अफ़सोस तुम पर जब सब लोग तुम्हें अच्छा कहें, क्यूँकि उनके बाप-दादा झूटे नबियों के साथ भी ऐसा ही किया करते थे |” २७“ ““लेकिन मैं सुनने वालों से कहता हूँ कि अपने दुश्मनों से मुहब्बत रख्खो, जो तुम से 'दुश्मनी रख्खें उसके साथ नेकी करो |” २८जो तुम पर ला'नत करें उनके लिए बरकत चाहो, जो तुमसे नफरत करें उनके लिए दू'आ करो | २९जो तेरे एक गाल पर तमाँचा मारे दूसरा भी उसकी तरफ़ फेर दे, और जो तेरा चोगा ले उसको कुर्ता लेने से भी मना' न कर | ३०जो कोई तुझ से माँगे उसे दे, और जो तेरा माल ले ले उससे तलब न कर | ३१और जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो | ३२“ ““अगर तुम अपने मुहब्बत रखनेवालों ही से मुहब्बत रख्खो, तो तुम्हारा क्या अहसान है? क्यूँकि गुनाहगार भी अपने मुहब्बत रखनेवालों से मुहब्बत रखते हैं |” ३३और अगर तुम उन ही का भला करो जो तुम्हारा भला करें, तो तुम्हारा क्या अहसान है? क्यूँकि गुनहगार भी ऐसा ही करते हैं | ३४और अगर तुम उन्हीं को कर्ज़ दो जिनसे वसूल होने की उम्मीद रखते हो, तो तुम्हारा क्या अहसान है? गुनहगार भी गुनहगारों को कर्ज़ देते हैं ताकि पूरा वसूल कर लें ३५मगर तुम अपने दुश्मनों से मुहब्बत रख्खो, और नेकी करो, और बगैर न उम्मीद हुए कर्ज़ दो तो तुम्हारा अज्र बड़ा होगा और तुम खुदा के बेटे ठहरोगे, क्यूँकि वो न-शुक्रों और बदों पर भी महरबान है | ३६जैसा तुम्हारा बाप रहीम है तुम भी रहम दिल हो | ३७'ऐबजोई ना करो, तुम्हारी भी 'ऐबजोई न की जाएगी | मुजरिम न ठहराओ,तुम भी मुजरिम ना ठहराये जाओगे | इज्ज़त दो, तुम भी इज्ज़त पाओगे | ३८“ दिया करो, तुम्हें भी दिया जाएगा | अच्छा पैमाना दाब-दाब कर और हिला-हिला कर और लबरेज़ करके तुम्हारे पल्ले में डालेंगे, क्यूँकि जिस पैमाने से तुम नापते हो उसी से तुम्हारे लिए नापा जाएगा |""” ३९“ और उसने उनसे एक मिसाल भी दी”” क्या अंधे को अँधा राह दिखा सकता है ? क्या दोनों गड्ढे में न गिरेंगे?"”” ४०शागिर्द अपने उस्ताद से बड़ा नहीं, बल्कि हर एक जब कामिल हुआ तो अपने उस्ताद जैसा होगा | ४१तू क्यूँ अपने भाई की आँख के तिनके को देखता है, और अपनी आँख के शहतीर पर गौर नहीं करता? ४२और जब तू अपनी आँख के शहतीर को नहीं देखता तो अपने भाई से क्यूँकर कह सकता है, कि भाई ला उस तिनके को जो तेरी आँख में है निकाल दूँ? ऐ रियाकार | पहले अपनी आँख में से तो शहतीर निकाल, फिर उस तिनके को जो तेरे भाई की आँख में है अच्छी तरह देखकर निकाल सकेगा | ४३“ ““क्यूँकि कोई अच्छा दरख्त नहीं जो बुरा फल लाए, और न कोई बुरा दरख्त है जो अच्छा फल लाए |” ४४हर दरख्त अपने फल से पहचाना जाता है, क्यूँकि झाड़ियों से अंजीर नहीं तोड़ते और न झड़बेरी से अंगूर | ४५“ ““अच्छा आदमी अपने दिल के अच्छे ख़ज़ाने से अच्छी चीज़ें निकालता है, और बुरा आदमी बुरे ख़ज़ाने से बुरी चीज़ें निकालता है; क्यूँकि जो दिल में भरा है वही उसके मुँह पर आता है |""” ४६जब तुम मेरे कहने पर 'अमल नहीं करते तो क्यूँ मुझे 'खुदावन्द, खुदावन्द' कहते हो | ४७जो कोई मेरे पास आता और मेरी बातें सुनकर उन पर 'अमल करता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वो किसकी तरह है | ४८वो उस आदमी की तरह है जिसने घर बनाते वक्त ज़मीन गहरी खोदकर चट्टान पर बुनियाद डाली, जब तूफ़ान आया और सैलाब उस घर से टकराया, तो उसे हिला न सका क्यूँकि वो मज़बूत बना हुआ था || ४९“ लेकिन जो सुनकर 'अमल में नहीं लाता वो उस आदमी की तरह है जिसने ज़मीन पर घर को बे-बुनियाद बनाया, जब सैलाब उस पर ज़ोर से आया तो वो फौरन गिर पड़ा और वो घर बिलकुल बर्बाद हुआ |""”