इन बातों के बा'द खुदावन्द ने सत्तर आदमी और मुकर्रर किए, और जिस जिस शहर और जगह को खुद जाने वाला था वहाँ उन्हें दो दो करके अपने आगे भेजा | “ और वो उनसे कहने लगा, ““फस्ल तो बहुत है, लेकिन मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फस्ल के मालिक की मिन्नत करो कि अपनी फस्ल काटने के लिए मज़दूर भेजे |""” जाओ; देखो, मैं तुम को गोया बर्रों को भेडियों के बीच मैं भेजता हूँ | न बटुवा ले जाओ न झोली, न जूतियाँ और न राह में किसी को सलाम करो | और जिस घर में दाखिल हो पहले कहो,‘इस घर की सलामती हो।’ अगर वहाँ कोई सलामती का फ़र्ज़न्द होगा तो तो तुम्हारा सलाम उस पर ठहरेगा, नहीं तो तुम पर लौट आएगा | उसी घर में रहो और जो कुछ उनसे मिले खाओ-पीओ, क्यूँकि मज़दूर अपने मज़दूरी का हक़दार है, घर घर न फिरो | जिस शहर में दाख़िल हो वहाँ के लोग तुम्हें क़ुबूल करें, तो जो कुछ तुम्हारे सामने रखा जाए खाओ; और वहाँ के बीमारों को अच्छा करो और उनसे कहो, 'खुदा की बादशाही तुम्हारे नज़दीक आ पहुँची है |' १०लेकिन जिस शहर में तुम दाखिल हो और वहाँ के लोग तुम्हें क़ुबूल न करें, तो उनके बाज़ारों में जाकर कहो कि, ११'हम इस गर्द को भी जो तुम्हारे शहर से हमारे पैरों में लगी है तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं, मगर ये जान लो कि खुदा की बादशाही नज़दीक आ पहुँची है |' १२मैं तुम से कहता हूँ कि उस दिन सदोम का हाल उस शहर के हाल से ज़्यादा बर्दाशत के लायक होगा | १३“ ““ऐ ख़ुराज़ीन, तुझ पर अफ़सोस ! ऐ बैतसैदा , तुझ पर अफ़सोस ! क्यूँकि जो मो'जिज़े तुम में ज़ाहिर हुए अगर सूर और सैदा में ज़ाहिर होते , तो वो टाट ओढ़कर और ख़ाक में बैठकर कब के तौबा कर लेते |""” १४मगर 'अदालत में सूर और सैदा का हाल तुम्हारे हाल से ज़्यादा बर्दाशत के लायक होगा | १५और तू ऐ कफ़र्नहूम, क्या तू आसमान तक बुलन्द किया जाएगा? नहीं, बल्कि तू 'आलम-ए-अर्वाह में उतारा जाएगा | १६“ ““जो तुम्हारी सुनता है वो मेरी सुनता है, और जो तुम्हें नहीं मानता वो मुझे नहीं मानता, और जो मुझे नहीं मानता वो मेरे भेजनेवाले को नहीं मानता |""” १७“ वो सत्तर खुश होकर फिर आए और कहने लगे, ““ऐ खुदावन्द, तेरे नाम से बदरूहें भी हमारे ताबे' हैं |""” १८“ उसने उनसे कहा, ““मैं शैतान को बिजली की तरह आसमान से गिरा हुआ देख रहा था |""” १९देखो, मैंने तुम को इख़्तियार दिया कि साँपों और बिच्छुओं को कुचलो और दुश्मन की सारी कुदरत पर ग़ालिब आओ, और तुम को हरगिज़ किसी चीज़ से नुक्सान न पहुंचेगा | २०“ तोभी इससे खुश न हो कि रूहें तुम्हारे ताबे' हैं बल्कि इससे खुश हो कि तुम्हारे नाम आसमान पर लिखे हुए है |""” २१“ उसी घड़ी वो रु-उल-कुद्दस से ख़ुशी में भर गया और कहने लगा, ““ऐ बाप ! आसमान और ज़मीन के खुदावन्द, में तेरी हम्द करता हूँ कि तूने ये बातें होशियारों और 'अक्लमन्दों से छिपाई और बच्चों पर ज़ाहिर कीं हाँ, ऐ, बाप क्यूँकि ऐसा ही तुझे पसंद आया |""” २२“ मेरे बाप की तरफ़ से सब कुछ मुझे सौंपा गया; और कोई नहीं जानता कि बेटा कौन है सिवा बाप के, और कोई नहीं जानता कि बाप कौन है सिवा बेटे के और उस शख्स के जिस पर बेटा उसे ज़ाहिर करना चाहे |""” २३“ और शागिर्दों की तरफ़ मूखातिब होकर खास उन्हीं से कहा, ““मुबारक है वो आँखें जो ये बातें देखती हैं जिन्हें तुम देखते हो |""” २४“ क्यूँकि मैं तुम से कहता हूँ कि बहुत से नबियों और बादशाहों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो देखें मगर न देखी, और जो बातें तुम सुनते हो सुनें मगर न सुनीं |""” २५“ और देखो, एक शरा का आलिम उठा, और ये कहकर उसकी आज़माइश करने लगा, ““ऐ उस्ताद, मैं क्या करूँ कि हमेशा की ज़िन्दगी का बारिस बनूँ?"”” २६“ उसने उससे कहा, ““तौरेत में क्या लिखा है? तू किस तरह पढ़ता है?"”” २७“ उसने जवाब में कहा, ““खुदावन्द अपने खुदा से अपने सारे दिल और अपनी सारी जान और अपनी सारी ताकत और अपनी सारी 'अक्ल से मुहब्बत रख और अपने पड़ोसी से अपने बराबर मुहब्बत रख |""” २८“ उसने उससे कहा, ““तूने ठीक जवाब दिया, यही कर तो तू जिएगा |""” २९“ मगर उसने अपने आप को रास्तबाज़ ठहराने की गरज़ से ईसा' से पूछा, ““फिर मेरा पड़ोसी कौन है?"”” ३०ईसा' ने जवाब में कहा, “एक आदमी यरूशलीम से यरीहू की तरफ़ जा रहा था कि डाकुओं में घिर गया | उन्होंने उसके कपड़े उतार लिए और मारा भी और अधमरा छोड़कर चले गए | ३१इत्तफाकन एक काहिन उसी राह से जा रहा था, और उसे देखकर कतरा कर चला चला गया | ३२इसी तरह एक लावी उस जगह आया, वो भी उसे देखकर कतरा कर चला गया | ३३लेकिन एक सामरी सफ़र करते करते वहाँ आ निकला, और उसे देखकर उसने तरस खाया | ३४और उसके पास आकर उसके ज़ख्मों को तेल और मय लगा कर बाँधा, और अपने जानवर पर सवार करके सराय में ले गया और उसकी देखरेख की | ३५दुसरे दिन दो दीनार निकालकर भटयारे को दिए और कहा, 'इसकी देख भाल करना और जो कुछ इससे ज्यादा खर्च होगा मैं फिर आकर तुझे अदा कर दूँगा | ३६“ इन तीनों में से उस शख्स का जो डाकुओं में घिर गया था तेरी नज़र में कौन पड़ोसी ठहरा?"”” ३७“ उसने कहा, ““वो जिसने उस पर रहम किया ईसा' ने उससे कहा, ““जा तू भी ऐसा ही कर |""” ३८फिर जब जा रहे थे तो वो एक गाँव में दाख़िल हुआ और मर्था नाम 'औरत ने उसे अपने घर में उतारा | ३९और मरियम नाम उसकी एक बहन थी, वो ईसा' के पाँव के पास बैठकर उसका कलाम सुन रही थी | ४०“ लेकिन मर्था ख़िदमत करते करते घबरा गई, पस उसके पास आकर कहने लगी, ““ऐ खुदावन्द, क्या तुझे खयाल नहीं कि मेरी बहन ने ख़िदमत करने को मुझे अकेला छोड़ दिया है, पस उसे कह कि मेरी मदद करे |""” ४१“ खुदावन्द ने जवाब में उससे कहा, ““मर्था, मर्था, तू बहुत सी चीज़ों की फ़िक्र-ओ-तरद्दुद में है |” ४२“ लेकिन एक चीज़ ज़रूर है और मरियम ने वो अच्छा हिस्सा चुन लिया है जो उससे छीना न जाए |""”