१वो फिर झील के किनारे ता'लीम देने लगा ; और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ जमा हो गई, वो झील में एक नाव में जा बैठा और सारी भीड़ ख़ुश्की पर झील के किनारे रही। २और वो उनको मिसालों में बहुत सी बातें सिखाने लगा,और अपनी ता'लीम में उनसे कहा। ३“सुनो! देखो; एक बोने वाला बीज बोने निकला। ४और बोते वक़्त यूँ हुआ कि कुछ राह के किनारे गिरा और परिन्दों ने आकर उसे चुग लिया। ५ओर कुछ पत्थरीली ज़मीन पर गिरा, जहाँ उसे बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने की वजह से जल्द उग आया। ६और जब सुरज निकला तो जल गया और जड़ न होने की वजह से सूख गया। ७और कुछ झाड़ियों में गिरा और झाड़ियों ने बढ़कर दबा लिया, और वो फल न लाया। ८और कुछ अच्छी ज़मीन पर गिरा और वो उगा और बढ़कर फला; और कोई तीस गुना कोई साठ गुना कोई सौ गुना फ़ल लाया।” ९“फिर उसने कहा! जिसके सुनने के कान हों वो सुन ले।” १०जब वो अकेला रह गया तो उसके साथियों ने उन बारह समेत उसे इन मिसालों के बारे मे पूछा।? ११उसने उनसे कहा “तुम को ख़ुदा की बादशाही का भी राज़ दिया गया है; मगर उनके लिए जो बाहर हैं सब बातें मिसालों में होती हैं १२ताकि वो देखते हुए देखें और मा'लूम न करें‘ और सुनते हुए सुनें और न समझें’ऐसा न हो कि वो फिर जाएँ और मु'आफ़ी पाएँ।” १३फिर उसने उनसे कहा “क्या तुम ये मिसाल नहीं समझे? फिर सब मिसालो को क्यूँकर समझोगे।? १४बोनेवाला कलाम बोता है। १५जो राह के किनारे हैं जहाँ कलाम बोया जाता है ये वो हैं कि जब उन्होंने सुना तो शैतान फ़ौरन आकर उस कलाम को जो उस में बोया गया था, उठा ले जाता है। १६और इसी तरह जो पत्थरीली ज़मीन में बोए गए, ये वो हैं जो कलाम को सुन कर फ़ौरन खुशी से क़बूल कर लेते हैं। १७और अपने अन्दर जड़ नहीं रखते, बल्कि चन्द रोजा हैं, फिर जब कलाम के वजह से मुसीबत या ज़ुल्म बर्पा होता है तो फ़ौरन ठोकर खाते हैं। १८और जो झाड़ियो में बोए गए, वो और हैं ये वो हैं जिन्होंने कलाम सुना। १९और दुनिया की फ़िक्र और दौलत का धोका और और चीज़ों का लालच दाखिल होकर कलाम को दबा देते हैं, और वो बेफ़ल रह जाता है। २०और जो अच्छी ज़मीन में बोए गए, ये वो हैं जो कलाम को सुनते और क़ुबूल करते और फ़ल लाते हैं; कोई तीस गुना कोई साठ गुना और कोई सौ गुना। २१और उसने उनसे कहा क्या चराग़ इसलिए जलाते हैं कि पैमाना या पलंग के नीचे रख्खा जाए? क्या इसलिए नहीं कि चराग़दान पर रख्खा जाए“। २२क्यूंकि कोई चीज़ छिपी नहीं मगर इसलिए कि ज़ाहिर हो जाए, और पोशीदा नहीं हुई, मगर इसलिए कि सामने में आए। २३अगर किसी के सुनने के कान हों तो सुन लें।” २४फिर उसने उनसे कहा “ख़बरदार रहो; कि क्या सुनते हो जिस पैमाने से तुम नापते हो उसी से तुम्हारे लिए नापा जाएगा, और तुम को ज़्यादा दिया जाएगा। २५क्यूंकि जिसके पास है उसे दिया जाएगा और जिसके पास नहीं है उस से वो भी जो उसके पास है ले लिया जाएगा।” २६और उसने कहा“ख़ुदा की बादशाही ऐसी है जैसे कोई आदमी ज़मीन में बीज डाले। २७और रात को सोए और दिन को जागे और वो बीज इस तरह उगे और बढ़े कि वो न जाने। २८ज़मीन आप से आप फ़ल लाती है, पहले पत्ती फिर बालों में तैयार दाने। ” २९फिर जब अनाज पक चुका तो वो फ़ौरन दरांती लगाता है क्यूंकि काटने का वक़्त आ पहुँचा। ३०फिर उसने कहा“हम ख़ुदा की बादशाही को किससे मिसाल दें और किस मिसाल में उसे बयान करें? ३१वो राई के दाने की तरह है कि जब ज़मीन में बोया जाता है तो ज़मीन के सब बीजों से छोटा होता है। ३२मगर जब बो दिया गया तो उग कर सब तरकारियों से बड़ा हो जाता है और ऐसी बड़ी डालियाँ निकालता है कि हवा के परिन्दे उसके साये में बसेरा कर सकते हैं।” ३३और वो उनको इस क़िस्म की बहुत सी मिसालें दे दे कर उनकी समझ के मुताबिक़ कलाम सुनाता था। ३४और बे मिसाल उनसे कुछ न कहता था, लेकिन तन्हाई में अपने ख़ास शागिर्दों से सब बातों के मा'ने बयान करता था। ३५उसी दिन जब शाम हुई तो उसने उनसे कहा“आओ पार चलें।” ३६और वो भीड़ को छोड़ कर उसे जिस हाल में वो था, नाव पर साथ ले चले,और उसके साथ और नावें भी थीं। ३७तब बड़ी आँधी चली और लहरें नाव पर यहाँ तक आईं कि नाव पानी से भरी जाती थी। ३८और वो ख़ुद पीछे की तरफ़ गद्दी पर सो रहा था“पस उन्होंने उसे जगा कर कहा? ऐ उस्ताद क्या तुझे फ़िक्र नहीं कि हम हलाक हुए जाते हैं।” ३९उसने उठकर हवा को डांटा और पानी से कहा“साकित हो या'नी थम जा!”पस हवा बन्द हो गई, और बडा अमन हो गया। ४०फिर उसने कहा“तुम क्यूँ डरते हो? अब तक ईमान नहीं रखते।” ४१और वो निहायत डर गए और आपस में कहने लगे “ये कौन है कि हवा और पानी भी इसका हुक्म मानते हैं।”